परंतु अंतिम विजय प्राप्त करना हो तो केवल प्रबल इच्छाशक्ति से काम नहीं होता, उसके लिए संगठित और विधिवत् प्रयास और कर्तव्यनिष्ठ नेतृत्व की आवश्यकता होती है। इसलिए अपनी सेना सहित और अपार संपति सहित रूहेलखंड का शूर बख्त खान दिल्ली पहुंचा-अर्थात् उसे ईश्वर ने भेजा, ऐसा लगने लगा। इसका वर्णन उसी समय दिल्ली में ही रहते एक सज्जन ने अपनी दैनंदिनी (डायरी) में लिखा है। उस दैनंदिनी का एक उद्धरण उस काल की दिल्ली
परंतु अंतिम विजय प्राप्त करना हो तो केवल प्रबल इच्छाशक्ति से काम नहीं होता, उसके लिए संगठित और विधिवत् प्रयास और कर्तव्यनिष्ठ नेतृत्व की आवश्यकता होती है। इसलिए अपनी सेना सहित और अपार संपति सहित रूहेलखंड का शूर बख्त खान दिल्ली पहुंचा-अर्थात् उसे ईश्वर ने भेजा, ऐसा लगने लगा। इसका वर्णन उसी समय दिल्ली में ही रहते एक सज्जन ने अपनी दैनंदिनी (डायरी) में लिखा है। उस दैनंदिनी का एक उद्धरण उस काल की दिल्ली