1857 का स्वातंत्र्य समर - 251
को न मारते हुए छोड़ दिया गया। उस शहर कापूर्व मजिस्टेªट शेररे उस विजयी सेना के साथ आया था और बहुत दिन से रूकी हुई अपनी मजिस्टेªटी चलाने को वह अब उत्सुक था। इसलिए पहले लश्कर को शहर लूटने का आदेश दिया गया और जब उस शहर में लूटने के लिए कुछ भी शेष न रहा तब उस शहर को आग लगा देने का दूसरा आदेश हुआ। परंतु इस आदेश के पालन का सम्मान कवेल सिख सिपाहियों को ही दिए जाने के कारण
1857 का स्वातंत्र्य समर - 251
को न मारते हुए छोड़ दिया गया। उस शहर कापूर्व मजिस्टेªट शेररे उस विजयी सेना के साथ आया था और बहुत दिन से रूकी हुई अपनी मजिस्टेªटी चलाने को वह अब उत्सुक था। इसलिए पहले लश्कर को शहर लूटने का आदेश दिया गया और जब उस शहर में लूटने के लिए कुछ भी शेष न रहा तब उस शहर को आग लगा देने का दूसरा आदेश हुआ। परंतु इस आदेश के पालन का सम्मान कवेल सिख सिपाहियों को ही दिए जाने के कारण