1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

केवल इतना सुनकर ही मूर्ख लोग भड़क गए। सुनी हुई बात सच है या झूठ, इसकी खोज किसी ने नहीं की। एक ने कहा, इसलिए दूसरे ने कहा और दूसरा बिगड़ गया इसलिए तीसरा बिगड़ गया। ऐसी अंधपरंपरा चली जिससे अविवेकी मूर्खां का समाज जमा हुआ और विद्राह हो गया।

कारतूसों की बात पर लोगों ने अध्ंापरंपरा से विश्वास किया या क्या हुआ, इसका निर्णय आगे यथास्थान किया जाएगा, परंतु ये सच्चे या झूठे विश्वास विद्रोह की जड़ें थीं, यह विचार


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केवल इतना सुनकर ही मूर्ख लोग भड़क गए। सुनी हुई बात सच है या झूठ, इसकी खोज किसी ने नहीं की। एक ने कहा, इसलिए दूसरे ने कहा और दूसरा बिगड़ गया इसलिए तीसरा बिगड़ गया। ऐसी अंधपरंपरा चली जिससे अविवेकी मूर्खां का समाज जमा हुआ और विद्राह हो गया।

कारतूसों की बात पर लोगों ने अध्ंापरंपरा से विश्वास किया या क्या हुआ, इसका निर्णय आगे यथास्थान किया जाएगा, परंतु ये सच्चे या झूठे विश्वास विद्रोह की जड़ें थीं, यह विचार


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