1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

गिर गए। उन मरों पर मरे हुए और उनपर फिर मरे हुए। आज तक आदमी कुएं का पानी पीता था, परंतु आज कुएं ने आदमी का रक्त पीना चालू किया। फतेहगढ़ में जलते हुओं का आर्तनाद अंगे्रज आकाश में फेंक रहे थे, तभी बीबीगढ़ में रक्त से सनी गोरी चीखें पांडे पाताल में फेंक रहे थे। मनुष्य प्राणी की इन दो भिन्न जातियों में सौ वर्ष से जमा रकम का हिसाब इस तरह चुकता होने लगा। कानपुर का कुआं, इसे भरने का जो-जो


1857 का स्वातंत्र्य समर - 253


1212 of 2102

गिर गए। उन मरों पर मरे हुए और उनपर फिर मरे हुए। आज तक आदमी कुएं का पानी पीता था, परंतु आज कुएं ने आदमी का रक्त पीना चालू किया। फतेहगढ़ में जलते हुओं का आर्तनाद अंगे्रज आकाश में फेंक रहे थे, तभी बीबीगढ़ में रक्त से सनी गोरी चीखें पांडे पाताल में फेंक रहे थे। मनुष्य प्राणी की इन दो भिन्न जातियों में सौ वर्ष से जमा रकम का हिसाब इस तरह चुकता होने लगा। कानपुर का कुआं, इसे भरने का जो-जो


1857 का स्वातंत्र्य समर - 253


1212 of 2102