जाते हैं वैसे ह ीवह संतोष के साथ फांसी में घुसा। उसकी धर्मनिष्ठता से उसे मृत्यु का डर नहीं रह गया था। फिरंगियों के दुष्टापूर्ण संसर्ग से छूटकर परलोक का धु्रव सुख देनेवाला रास्ता ही मृत्यु है-यह जिसके धर्म की निष्ठा थी उसे मृत्यु का डर कैसे स्पर्श करे।’’
कानपुर शहर में अंगे्रजी सेना ऐसा स्वच्छंद प्रतिशोध ले रही थी-मुट्ठी भर अंग्रेज सेना और राजनिष्ठ सिख सिपाहियों ने इलाहाबाद से चलने के बाद व्यवस्था,
जाते हैं वैसे ह ीवह संतोष के साथ फांसी में घुसा। उसकी धर्मनिष्ठता से उसे मृत्यु का डर नहीं रह गया था। फिरंगियों के दुष्टापूर्ण संसर्ग से छूटकर परलोक का धु्रव सुख देनेवाला रास्ता ही मृत्यु है-यह जिसके धर्म की निष्ठा थी उसे मृत्यु का डर कैसे स्पर्श करे।’’
कानपुर शहर में अंगे्रजी सेना ऐसा स्वच्छंद प्रतिशोध ले रही थी-मुट्ठी भर अंग्रेज सेना और राजनिष्ठ सिख सिपाहियों ने इलाहाबाद से चलने के बाद व्यवस्था,