पर भी उसका उपयोग न कर या सेना की नौकरी छोड़ सारी किटकिट से परे न हटकर सेना के सिपाहियों ने ही नहीं बल्कि सेना से जिनका दूर का भी संबंध नहीं था-ऐसे लाखों लोगों ने, राजा-महाराजाओं ने अपने प्राण रणभूमि पर क्यों अर्तित किए? फौजी और सामान्य जन, राजा और रंक, हिंदू और मुसलमान-इन सबको एक साथ आवेशित करनेवाली बातें क्षुद्र नहीं होती, उसके मूल में होते हैं तात्त्विक कारण।
कारतूसों का डर ही विद्रोह का प्रमुख
पर भी उसका उपयोग न कर या सेना की नौकरी छोड़ सारी किटकिट से परे न हटकर सेना के सिपाहियों ने ही नहीं बल्कि सेना से जिनका दूर का भी संबंध नहीं था-ऐसे लाखों लोगों ने, राजा-महाराजाओं ने अपने प्राण रणभूमि पर क्यों अर्तित किए? फौजी और सामान्य जन, राजा और रंक, हिंदू और मुसलमान-इन सबको एक साथ आवेशित करनेवाली बातें क्षुद्र नहीं होती, उसके मूल में होते हैं तात्त्विक कारण।
कारतूसों का डर ही विद्रोह का प्रमुख