पर बैठाया था। वह बादशाह शांतिकाल में दयाशीलता में कितना ही चरित्रवान् हो, परंतु युद्धकाल में अत्यावश्यक रणपटुता और नेतृत्व में असमर्थ और पूरी तरह अनभ्यस्त था। रणपटु सेना को भी लज्जित किया था। अंगे्रजों की अधीनता मंे ही जिनके शस्त्राभ्यास और अनुशासन की शिक्षा पूरी हुई थी, जिन्होंने तलवार से ही अंगे्रजों के लिए अफगानिस्तान तक साम्राज्य की सीमा बढ़ाई थी, ऐसे कोई पचास हजार सिपाही उस दिल्ली की चारदीवारी
पर बैठाया था। वह बादशाह शांतिकाल में दयाशीलता में कितना ही चरित्रवान् हो, परंतु युद्धकाल में अत्यावश्यक रणपटुता और नेतृत्व में असमर्थ और पूरी तरह अनभ्यस्त था। रणपटु सेना को भी लज्जित किया था। अंगे्रजों की अधीनता मंे ही जिनके शस्त्राभ्यास और अनुशासन की शिक्षा पूरी हुई थी, जिन्होंने तलवार से ही अंगे्रजों के लिए अफगानिस्तान तक साम्राज्य की सीमा बढ़ाई थी, ऐसे कोई पचास हजार सिपाही उस दिल्ली की चारदीवारी