के अंदर से उन अभिमानी अंगे्रजों को एक जगह बांधकर आज तक चिढ़ा रहे थे। परंतु उन पचास हजार सिरों को एकीकृत करनेवाला एक सिर फिर भी दिल्ली को चाहिए था। इन इतने भिन्न-भिन्न मणियों की स्वतंत्रता की उत्सुकता एक धागे में पिरोई गई थी। परंतु अंतिम सूत्रमणि का बंधन न मिलने से यह बंधरहित माला एक झटके में आब तक छितर नहीं गई यही एक आश्चर्य था। स्वतंत्रता की हवा से ये रेत कण एक बादल में मिल गए थे, पर हवा से उत्पन्न
के अंदर से उन अभिमानी अंगे्रजों को एक जगह बांधकर आज तक चिढ़ा रहे थे। परंतु उन पचास हजार सिरों को एकीकृत करनेवाला एक सिर फिर भी दिल्ली को चाहिए था। इन इतने भिन्न-भिन्न मणियों की स्वतंत्रता की उत्सुकता एक धागे में पिरोई गई थी। परंतु अंतिम सूत्रमणि का बंधन न मिलने से यह बंधरहित माला एक झटके में आब तक छितर नहीं गई यही एक आश्चर्य था। स्वतंत्रता की हवा से ये रेत कण एक बादल में मिल गए थे, पर हवा से उत्पन्न