के राजमंडल द्वारा स्थापित किसी भी राजमंडल का आधिपत्य स्वीकार कर अपने साम्राज्य अधिपति के अधिकर मैं स्वयं उसके हाथ में देने को खुशी से तैयार हूं’’
यह पत्र मुसलमान धर्म का समर्थक दिल्ली का बादशाह हिंदुस्थान के हिंदू धर्मीय राजाओं को भेज रहा है। सन् 1857 के साल में स्वतंत्रता, स्वराज्य, स्वदेश और स्वधर्म आदि उदाŸा शब्दों का कितना यथार्थ बोध हिंदुस्थान के लोगों को हुआ था, यह उपर्युक्त अद्भुत पत्र से
के राजमंडल द्वारा स्थापित किसी भी राजमंडल का आधिपत्य स्वीकार कर अपने साम्राज्य अधिपति के अधिकर मैं स्वयं उसके हाथ में देने को खुशी से तैयार हूं’’
यह पत्र मुसलमान धर्म का समर्थक दिल्ली का बादशाह हिंदुस्थान के हिंदू धर्मीय राजाओं को भेज रहा है। सन् 1857 के साल में स्वतंत्रता, स्वराज्य, स्वदेश और स्वधर्म आदि उदाŸा शब्दों का कितना यथार्थ बोध हिंदुस्थान के लोगों को हुआ था, यह उपर्युक्त अद्भुत पत्र से