1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

उसमें कोई लज्जा नहीं। क्योंकि तू स्वराज्य के लिए, स्वधर्म के लिए, स्वदेश के लिए लड़ी थी! अतः ‘दन्तछेदो हि नगानां श्लाघ्यो गिरिविदारणे!’ पर्वत से जूझते हुए चूर्ण हुआ दांत ही गजश्रेष्ठ के लिए होता है।


1857 का स्वातंत्र्य समर - 283

प्रकरण-5

लखनऊ

अव्यस्थित राज्य पद्धति से प्रजा का संरक्षण करने के लिए अवध के घरों में कोने कोने तक घुसी बैठी अंगे्रजी सŸाा को जून माह में क्रांतिकारियों ने मार-पीटकर


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उसमें कोई लज्जा नहीं। क्योंकि तू स्वराज्य के लिए, स्वधर्म के लिए, स्वदेश के लिए लड़ी थी! अतः ‘दन्तछेदो हि नगानां श्लाघ्यो गिरिविदारणे!’ पर्वत से जूझते हुए चूर्ण हुआ दांत ही गजश्रेष्ठ के लिए होता है।


1857 का स्वातंत्र्य समर - 283

प्रकरण-5

लखनऊ

अव्यस्थित राज्य पद्धति से प्रजा का संरक्षण करने के लिए अवध के घरों में कोने कोने तक घुसी बैठी अंगे्रजी सŸाा को जून माह में क्रांतिकारियों ने मार-पीटकर


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