होती उद्धिग्नता-इन सारे संकटों की परवाह न करते हुए रणभूमि पर देशवीरों और धर्मवीरों की भांति अचल, मृत्यु का वरण करते हुए सत्कृत्य दोनों ही भावी पीढ़ी के अभिमान के ही पात्र होंगे। इसलिए लज्जास्पद नहीं, उन दोषों और सत्कृत्यों की पंक्ति के एक अद्भुत तŸवनिष्ठा का तेज, स्वधर्माभिमान का तेज, स्वदेश स्वतंत्रता का तेज, झिलमिलाता होने से वे दोनों ही कृत्य नैतिक उदाहरण के मूर्त व्याख्यान हैं।
हे दिल्ली नगरी! तू गिरी,
होती उद्धिग्नता-इन सारे संकटों की परवाह न करते हुए रणभूमि पर देशवीरों और धर्मवीरों की भांति अचल, मृत्यु का वरण करते हुए सत्कृत्य दोनों ही भावी पीढ़ी के अभिमान के ही पात्र होंगे। इसलिए लज्जास्पद नहीं, उन दोषों और सत्कृत्यों की पंक्ति के एक अद्भुत तŸवनिष्ठा का तेज, स्वधर्माभिमान का तेज, स्वदेश स्वतंत्रता का तेज, झिलमिलाता होने से वे दोनों ही कृत्य नैतिक उदाहरण के मूर्त व्याख्यान हैं।
हे दिल्ली नगरी! तू गिरी,