1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

के नवाब द्वारा निकाले गए दूसरे एक आज्ञापत्र में वे कहते हैं-‘‘हिंदुस्थान के सारे हिंदुओं और मुसलमानो, उठो! स्वदेश बंधुओं, परमेश्वर की दी हुई सौगात में सबसे श्रेष्ठ सौगात स्वराज्य (ैवअमतमपहद) ही है। यह ईश्वरीय सौगात जिसने हमसे छल से छीन ली है उस अत्याचारी राक्षस को वह बहुत दिन प्रचेगी क्या? यह ईश्वरीय इच्छा के विरूद्व किया गया कृत्य क्या जय प्राप्त करेगा? नहीं, नहीं। अंगेजों ने इतने जुल्म ढाए हैं कि उनके पाप के घड़े पहले ही लबालब भरे हुए हैं। और


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के नवाब द्वारा निकाले गए दूसरे एक आज्ञापत्र में वे कहते हैं-‘‘हिंदुस्थान के सारे हिंदुओं और मुसलमानो, उठो! स्वदेश बंधुओं, परमेश्वर की दी हुई सौगात में सबसे श्रेष्ठ सौगात स्वराज्य (ैवअमतमपहद) ही है। यह ईश्वरीय सौगात जिसने हमसे छल से छीन ली है उस अत्याचारी राक्षस को वह बहुत दिन प्रचेगी क्या? यह ईश्वरीय इच्छा के विरूद्व किया गया कृत्य क्या जय प्राप्त करेगा? नहीं, नहीं। अंगेजों ने इतने जुल्म ढाए हैं कि उनके पाप के घड़े पहले ही लबालब भरे हुए हैं। और


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