1857 का स्वातंत्र्य समर - 39
उसमें हमारे पवित्र धर्म का नाष करने की कुबुद्धि और समा गई है। अब आप अभी भी शांति से बैठे रहेंगे क्या? आप शांति से बैंठे, यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है। क्योंकि सारे हिंदुओं और मुसलमान के हृदय में उसी की इच्छा उत्पन्न हुई हैं-परमेश्वर की इच्छा-और आपके पराक्रम से जल्दी ही उनका ऐसा सर्वनाश हो जाएगा कि अपने हिंदुस्तान में उनका छिलका, टुकड़ा भी नहीं रहेगा। छोटे-बड़े के सारे
1857 का स्वातंत्र्य समर - 39
उसमें हमारे पवित्र धर्म का नाष करने की कुबुद्धि और समा गई है। अब आप अभी भी शांति से बैठे रहेंगे क्या? आप शांति से बैंठे, यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है। क्योंकि सारे हिंदुओं और मुसलमान के हृदय में उसी की इच्छा उत्पन्न हुई हैं-परमेश्वर की इच्छा-और आपके पराक्रम से जल्दी ही उनका ऐसा सर्वनाश हो जाएगा कि अपने हिंदुस्तान में उनका छिलका, टुकड़ा भी नहीं रहेगा। छोटे-बड़े के सारे