1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

यह समझते ही अपमान होता। अंगे्रजों के झंडे पर गोला फेंक उसे गिराकर होता विद्रोहियों का मनोरंजन तो रात होते ही फिर से नया झंडा रेसीडंेसी पर फहराने की अंगे्रजी जिद। युद्ध के इस


1857 का स्वातंत्र्य समर - 288

भीषण उपहास से लखनऊ की रणभूमि कभी-कभी जोरों से हंसती भी थी।’’

पर अंगे्रजों की ओर के नेटिव सिपाहियों ने जो शूरता दिखाई उसे देखकर रणांरण के भूत-पिशाच जितने हंसे उतना बीभत्स हास्य रस कभी भी उत्पन्न


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यह समझते ही अपमान होता। अंगे्रजों के झंडे पर गोला फेंक उसे गिराकर होता विद्रोहियों का मनोरंजन तो रात होते ही फिर से नया झंडा रेसीडंेसी पर फहराने की अंगे्रजी जिद। युद्ध के इस


1857 का स्वातंत्र्य समर - 288

भीषण उपहास से लखनऊ की रणभूमि कभी-कभी जोरों से हंसती भी थी।’’

पर अंगे्रजों की ओर के नेटिव सिपाहियों ने जो शूरता दिखाई उसे देखकर रणांरण के भूत-पिशाच जितने हंसे उतना बीभत्स हास्य रस कभी भी उत्पन्न


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