में भीड़ जुटाई। हैवलाॅक के कानपुर से गंगा उतरकर अवध में घुसते ही नाना अवध से गंगा उतर कानपुर में घुस रहे थे। कहीं नाना के इस लश्करी दांव में ने फंस जाएं, इस डर से हैवलाॅक मंगलबड़ में 4 अगस्त तक बंधा पड़ा रहा। पांच-छह दिन में लखनऊ जाकर क्रांतिकारियों को गोमती का पानी पिलाने की जगह अब उसे नाना ही गंगा तीर पर पानी पिला रहा था। इतने में विद्रोही फिर से बशीरगंज दौड़ आए। तब उनके इस उद्दाम व्यवहार से चिढ़कर हैवलाॅक
में भीड़ जुटाई। हैवलाॅक के कानपुर से गंगा उतरकर अवध में घुसते ही नाना अवध से गंगा उतर कानपुर में घुस रहे थे। कहीं नाना के इस लश्करी दांव में ने फंस जाएं, इस डर से हैवलाॅक मंगलबड़ में 4 अगस्त तक बंधा पड़ा रहा। पांच-छह दिन में लखनऊ जाकर क्रांतिकारियों को गोमती का पानी पिलाने की जगह अब उसे नाना ही गंगा तीर पर पानी पिला रहा था। इतने में विद्रोही फिर से बशीरगंज दौड़ आए। तब उनके इस उद्दाम व्यवहार से चिढ़कर हैवलाॅक