1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

अवलंबित नहीं रहता। नील गिरा तो भी तिनके भर भ्रमित न होकर अंगे्रजी सेना रेसीडेंसी की ओर दौड़ती चली। जिस खास बाजार के फाटक मंे नील की गरदन टूटकर गिरी उस खास बाजार में गोरे रक्त की ताल-तलैयां भर गई, फिर भी अंगे्रजी सेना वैसे ही लड़ते चली। उस बाजार से रास्ता हो जाते ही उन्हें रेसीडेंसी से अति आनंद की जय गर्जना सुनाई देने लगी। उन्होंने भी जय गर्जना की। मृत्यु के जबड़े में हाथ डालकर हैवलाॅक ने अपने स्वदेश बंधुओं


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अवलंबित नहीं रहता। नील गिरा तो भी तिनके भर भ्रमित न होकर अंगे्रजी सेना रेसीडेंसी की ओर दौड़ती चली। जिस खास बाजार के फाटक मंे नील की गरदन टूटकर गिरी उस खास बाजार में गोरे रक्त की ताल-तलैयां भर गई, फिर भी अंगे्रजी सेना वैसे ही लड़ते चली। उस बाजार से रास्ता हो जाते ही उन्हें रेसीडेंसी से अति आनंद की जय गर्जना सुनाई देने लगी। उन्होंने भी जय गर्जना की। मृत्यु के जबड़े में हाथ डालकर हैवलाॅक ने अपने स्वदेश बंधुओं


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