1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

इस समर की मूल उत्पत्ति तभी ही हुई होगी जब यह प्रश्न पहले-पहल सामने आया होगा।

मैजिनी कहता है-‘‘स्वतंत्रता प्रत्येक का प्रकृतिदत्त अधिकार है और इसलिए इस पवित्र अधिकार का अपहरण करने की इच्छा के अत्याचार को मिटाना भी प्रत्येक का प्रकृतिदत्त कर्तव्य है। व्यक्ति की, राष्ट्र की एवं मनुष्य जाति की प्रगति के लिए


1857 का स्वातंत्र्य समर - 44

उसमें चैतन्य चाहिए। परंतु जहां स्वतंत्रता नहीं होती वहां चैतन्य


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इस समर की मूल उत्पत्ति तभी ही हुई होगी जब यह प्रश्न पहले-पहल सामने आया होगा।

मैजिनी कहता है-‘‘स्वतंत्रता प्रत्येक का प्रकृतिदत्त अधिकार है और इसलिए इस पवित्र अधिकार का अपहरण करने की इच्छा के अत्याचार को मिटाना भी प्रत्येक का प्रकृतिदत्त कर्तव्य है। व्यक्ति की, राष्ट्र की एवं मनुष्य जाति की प्रगति के लिए


1857 का स्वातंत्र्य समर - 44

उसमें चैतन्य चाहिए। परंतु जहां स्वतंत्रता नहीं होती वहां चैतन्य


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