1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

रहना संभव नहीं। जो लोगों की स्वतंत्रता छीन लेता है वह लोगों की प्रगति का विरोध कर पर-पीड़न का अक्षम्य पाप करता है। इतना ही नहीं अपितु अनजाने सारी मानव जाति का अर्थात् अपनी ही गरदन पर कुल्हाड़ी मारकर आत्महत्या के भयंकर पाप का भी भागीदार हो जाता है। यह पाप कर के आज तक किसका उद्धार हुआ है? ये गुलामी की बेड़ियां परमेश्वर की इच्छा के विरूद्व अपने मानवी बंधुओं के पैरों में जकड़कर आज तक किस पक्ष की विजय हुई है?


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रहना संभव नहीं। जो लोगों की स्वतंत्रता छीन लेता है वह लोगों की प्रगति का विरोध कर पर-पीड़न का अक्षम्य पाप करता है। इतना ही नहीं अपितु अनजाने सारी मानव जाति का अर्थात् अपनी ही गरदन पर कुल्हाड़ी मारकर आत्महत्या के भयंकर पाप का भी भागीदार हो जाता है। यह पाप कर के आज तक किसका उद्धार हुआ है? ये गुलामी की बेड़ियां परमेश्वर की इच्छा के विरूद्व अपने मानवी बंधुओं के पैरों में जकड़कर आज तक किस पक्ष की विजय हुई है?


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