1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

की तरह ही इस पांडुलिपि को भी प्रकाशन हेतु अपने बड़े भाई बाबाराव सावरकर के पास नासिक भेज दिया। ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसियां उस पांडुलिपि की खोज में लगी हुई थी। सावरकर ने पेरिस से प्रकाशित अपने उद्देश्यों को स्पष्ट किया। उन्होंने लिखा कि वे इस पुस्तक के द्वारा देशवासियों के मन में मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए द्वितीय निर्णायक युद्व का संकल्प जगाना चाहते हैं। वे उस इतिहास के माध्यम व दिशा-निर्देश भी करना


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की तरह ही इस पांडुलिपि को भी प्रकाशन हेतु अपने बड़े भाई बाबाराव सावरकर के पास नासिक भेज दिया। ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसियां उस पांडुलिपि की खोज में लगी हुई थी। सावरकर ने पेरिस से प्रकाशित अपने उद्देश्यों को स्पष्ट किया। उन्होंने लिखा कि वे इस पुस्तक के द्वारा देशवासियों के मन में मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए द्वितीय निर्णायक युद्व का संकल्प जगाना चाहते हैं। वे उस इतिहास के माध्यम व दिशा-निर्देश भी करना


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