ब्रिटिश साम्राज्य-बीसवीं शती के प्रथम दशक में जहां कभी सूर्यास्त नहीं होता था-इतना थर्रा गया था कि पुस्तक का नाम, उसके प्रकाशक व मुद्रक के नाम-पते का ज्ञान न होने पर भी उसने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। इस पुस्तक को ही यह गौरव प्राप्त है कि सन् 1901 में इसके प्रथम गुप्त संस्करण के प्रकाशन से 1947 में उसके प्रथम प्रकाशन तक के अड़तीस वर्ष लम्बे कालखं डमें उसके कितने ही गुप्त संस्करण अनेक भाषाओं में
ब्रिटिश साम्राज्य-बीसवीं शती के प्रथम दशक में जहां कभी सूर्यास्त नहीं होता था-इतना थर्रा गया था कि पुस्तक का नाम, उसके प्रकाशक व मुद्रक के नाम-पते का ज्ञान न होने पर भी उसने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। इस पुस्तक को ही यह गौरव प्राप्त है कि सन् 1901 में इसके प्रथम गुप्त संस्करण के प्रकाशन से 1947 में उसके प्रथम प्रकाशन तक के अड़तीस वर्ष लम्बे कालखं डमें उसके कितने ही गुप्त संस्करण अनेक भाषाओं में