1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

मूल्यवान मोती, रत्न आदि वस्तुएं उनको उपहारस्वरूप दी जाती। व्यक्ति के लिए द्वेष उनकी उदार आत्मा को कलुषित नहीं करता था, यह इससे अच्छी तरह सिद्व होता है। राष्ट्रयुद्ध में जिनकी दे हके टुकड़े-टुकड़े करना है उन्हीं प्रतिस्पर्धियों को अन्य अवसरों पर उपकृत करना, यह वीरता की उच्च कल्पना हिंदुस्थान के काव्य और इतिहास में हर क्षण दृष्टिगोचर होती आई है। राजपूत वीर अपने कट्टर शत्रु से भी युद्ध-अवसर को छोड़ ऐसी ही


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मूल्यवान मोती, रत्न आदि वस्तुएं उनको उपहारस्वरूप दी जाती। व्यक्ति के लिए द्वेष उनकी उदार आत्मा को कलुषित नहीं करता था, यह इससे अच्छी तरह सिद्व होता है। राष्ट्रयुद्ध में जिनकी दे हके टुकड़े-टुकड़े करना है उन्हीं प्रतिस्पर्धियों को अन्य अवसरों पर उपकृत करना, यह वीरता की उच्च कल्पना हिंदुस्थान के काव्य और इतिहास में हर क्षण दृष्टिगोचर होती आई है। राजपूत वीर अपने कट्टर शत्रु से भी युद्ध-अवसर को छोड़ ऐसी ही


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