उनकी कटी हुई गरदनें, चीरे हुए शरीर और बहनेवाले रक्त का लाल-लाल नाला-ये
1857 का स्वातंत्र्य समर - 60
सब इस प्रश्न की यथायोग्य चर्चा करेंगे और इस चर्चा को शांति से सुन कानपुर के कुएं पर बैठे गिद्ध इस प्रश्न का निश्चित उत्तर देंगे कि यह न्याय था या अन्याय।
नाना के घर ऐसे विशाल समारोह की तैयारी शुरू है तो उधर उनकी बहना छबीली भी शांत नहीं बैठी है। उसके भी सामने ‘न्याय या अन्याय’, यही प्रश्न आ पड़ा
उनकी कटी हुई गरदनें, चीरे हुए शरीर और बहनेवाले रक्त का लाल-लाल नाला-ये
1857 का स्वातंत्र्य समर - 60
सब इस प्रश्न की यथायोग्य चर्चा करेंगे और इस चर्चा को शांति से सुन कानपुर के कुएं पर बैठे गिद्ध इस प्रश्न का निश्चित उत्तर देंगे कि यह न्याय था या अन्याय।
नाना के घर ऐसे विशाल समारोह की तैयारी शुरू है तो उधर उनकी बहना छबीली भी शांत नहीं बैठी है। उसके भी सामने ‘न्याय या अन्याय’, यही प्रश्न आ पड़ा