1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

दोनों भाववाचक कल्पनाएं मानवीय मन को स्वीकार नहीं होती, अतः उनके कारण होनेवाले त्रास का प्रतिशोध लेने के लिए जब वह झल्लाकर बाहर निकल पड़ता है तब यह नहीं देखता कि उस जुल्म और अन्याय की जड़ में कौन है और जो सामने पड़ जाता है उसी गरीब को मारने लगता है। इस उतावली में जो अन्याय की जड़ या आत्मा है उसे भुला दिया जाता है। इस घालमेल के कारण कोई बड़ी हानिन यदि नहीं होती है तो उस उपेक्षा को क्षमा किया जा सकता है। परंतु


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दोनों भाववाचक कल्पनाएं मानवीय मन को स्वीकार नहीं होती, अतः उनके कारण होनेवाले त्रास का प्रतिशोध लेने के लिए जब वह झल्लाकर बाहर निकल पड़ता है तब यह नहीं देखता कि उस जुल्म और अन्याय की जड़ में कौन है और जो सामने पड़ जाता है उसी गरीब को मारने लगता है। इस उतावली में जो अन्याय की जड़ या आत्मा है उसे भुला दिया जाता है। इस घालमेल के कारण कोई बड़ी हानिन यदि नहीं होती है तो उस उपेक्षा को क्षमा किया जा सकता है। परंतु


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