अपमान, मानभंग के बादलों की गड़गड़ाहट होने लगी और उनमें से झांसी की उस चपला ने कड़कड़ाहट की-‘‘अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी।’’
अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी-जिसमें हिम्मत हो वह लेकर देखे!
1857 का स्वातंत्र्य समर - 61
प्रकरण-4
अवध
मानव जाति के दुर्भाग्य से इस जग में चोर को छोड़ संन्यासी को फांसी देने का न्याय हमेशा होता आया है। पर राजनीति के क्षेत्र में तो यह खुल्लम-खुल्ला किया जाता है। जुल्म और अन्याय
अपमान, मानभंग के बादलों की गड़गड़ाहट होने लगी और उनमें से झांसी की उस चपला ने कड़कड़ाहट की-‘‘अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी।’’
अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी-जिसमें हिम्मत हो वह लेकर देखे!
1857 का स्वातंत्र्य समर - 61
प्रकरण-4
अवध
मानव जाति के दुर्भाग्य से इस जग में चोर को छोड़ संन्यासी को फांसी देने का न्याय हमेशा होता आया है। पर राजनीति के क्षेत्र में तो यह खुल्लम-खुल्ला किया जाता है। जुल्म और अन्याय