1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

भारतीय रोज शरीर पर भभूत मलते रहें तब भी वे धर्मद्रोही ही हैं। जो किसी भी तरह की दासता में रहते हैं वे सारे हिंदू धर्मभष्ट्र हैं और वे सारे मुसलमान भी धर्मभष्ट्र हैं, फिर वे चाहे रोज हजार बार संध्या-वंदन कर रहे हों या हजार बार नमाज


1857 का स्वातंत्र्य समर - 72

पढ़ रहे हों। यह ध्यान में रखकर ही श्री समर्थ रामदास ने स्वराज्य-प्राप्ति को धर्म का मुख्य कर्तव्य कहा है। जो राज्य अपनी इच्छा के विरूद्ध बलपूर्वक


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भारतीय रोज शरीर पर भभूत मलते रहें तब भी वे धर्मद्रोही ही हैं। जो किसी भी तरह की दासता में रहते हैं वे सारे हिंदू धर्मभष्ट्र हैं और वे सारे मुसलमान भी धर्मभष्ट्र हैं, फिर वे चाहे रोज हजार बार संध्या-वंदन कर रहे हों या हजार बार नमाज


1857 का स्वातंत्र्य समर - 72

पढ़ रहे हों। यह ध्यान में रखकर ही श्री समर्थ रामदास ने स्वराज्य-प्राप्ति को धर्म का मुख्य कर्तव्य कहा है। जो राज्य अपनी इच्छा के विरूद्ध बलपूर्वक


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