1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

अपने पर थोपा गया है- ऐसे पर-राज्य को उखाड़ फेंकना, गुलामी की बेड़ियां तोड़ देना और मनुष्य जाति की उन्नति का जो प्रथम साधन होता है, वह स्वराज्य प्र्र्र्र्र्र्र्र्र्राप्त करना, स्वतंत्रता प्राप्त करना धर्म का प्रधान कर्तव्य है, ऐसा प्राणनाथ प्रभु का छत्रसाल को दिया गया या समर्थ का शिवाजी को दिया गया उपदेश दो शताब्दियों बाद हिंदुस्थान की पुण्यभूमि के पुरूषों के कान में ज्ञात या अज्ञात रूप से सन् 1857 में फिर से गूंजने लगा।


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अपने पर थोपा गया है- ऐसे पर-राज्य को उखाड़ फेंकना, गुलामी की बेड़ियां तोड़ देना और मनुष्य जाति की उन्नति का जो प्रथम साधन होता है, वह स्वराज्य प्र्र्र्र्र्र्र्र्र्राप्त करना, स्वतंत्रता प्राप्त करना धर्म का प्रधान कर्तव्य है, ऐसा प्राणनाथ प्रभु का छत्रसाल को दिया गया या समर्थ का शिवाजी को दिया गया उपदेश दो शताब्दियों बाद हिंदुस्थान की पुण्यभूमि के पुरूषों के कान में ज्ञात या अज्ञात रूप से सन् 1857 में फिर से गूंजने लगा।


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