1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

से अधिक उग्रता एवं ‘तस्मात् युद्धाएं युज्यस्व’ की चेतना से अधिक तेजस्विता आने लगी। ‘तस्मात् युद्धाए युज्यस्व’-क्योंकि स्वराज्य की होली हो चुकी है। तस्मात् युद्धाए युज्यस्व-स्वधर्म को पैरों तले कुचला जा रहा है और स्वतंत्रता का हनन हो रहा है। तस्मात् युद्धाए यज्यस्व-स्वदेश की स्वतंत्रता आज तक किसी को भी युद्ध के बिना प्राप्त नहीं हुई। छत्रपति को जिसके लिए ताना की बलि देनी पड़ी थी, वह स्वराज्य का सिंहगढ़


323 of 2102

से अधिक उग्रता एवं ‘तस्मात् युद्धाएं युज्यस्व’ की चेतना से अधिक तेजस्विता आने लगी। ‘तस्मात् युद्धाए युज्यस्व’-क्योंकि स्वराज्य की होली हो चुकी है। तस्मात् युद्धाए युज्यस्व-स्वधर्म को पैरों तले कुचला जा रहा है और स्वतंत्रता का हनन हो रहा है। तस्मात् युद्धाए यज्यस्व-स्वदेश की स्वतंत्रता आज तक किसी को भी युद्ध के बिना प्राप्त नहीं हुई। छत्रपति को जिसके लिए ताना की बलि देनी पड़ी थी, वह स्वराज्य का सिंहगढ़


323 of 2102