1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

कि ‘‘हमारे विरूद्व उठने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?’ इस अक्खड़ प्रश्न के उत्तर में सिपाहियों ने कहा, ‘‘हिंदुस्थानी सिपाही एक हो गया तो गोरा चटनी के लिए भी नहीं मिलेगा।’’

अंगे्रज सरकार ने सन् 1857 के आरंभ में ही सिपाहियों की चिट्ठियां खोलनी शुरू कर दी थी। उन पत्रों में से एक पत्र हिंदुस्थान के लोगों की शक्ति के संबंध में कहता है-‘‘विदेशियों को हम ही सिर चढ़ाए हुए हैं! यदि हम उठे तो फिरंगियों के मुट्ठी


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कि ‘‘हमारे विरूद्व उठने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?’ इस अक्खड़ प्रश्न के उत्तर में सिपाहियों ने कहा, ‘‘हिंदुस्थानी सिपाही एक हो गया तो गोरा चटनी के लिए भी नहीं मिलेगा।’’

अंगे्रज सरकार ने सन् 1857 के आरंभ में ही सिपाहियों की चिट्ठियां खोलनी शुरू कर दी थी। उन पत्रों में से एक पत्र हिंदुस्थान के लोगों की शक्ति के संबंध में कहता है-‘‘विदेशियों को हम ही सिर चढ़ाए हुए हैं! यदि हम उठे तो फिरंगियों के मुट्ठी


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