कर अपनी तलवारों पर पानी चढ़ाने लगा। इसी समय हिंदुस्थान की इतिहास-प्रसिद्ध राजधानी को भी मानो नई चेतना मिल गई और दिल्ली के रामहलों में स्वतंत्रता संग्राम की मंत्रणाएं शुरू हो गई। दिल्ली के बादशाह की बादशाही लेकर ही अंगे्रज नहीं रूके अपितु उनकी
1857 का स्वातंत्र्य समर - 81
‘बादशाह’ की शाब्दिक पदवी भी उनके बाद न चले, यह भी तह कर लिया। ऐसी पिन्नावस्था में अपना पूर्व वैभव प्राप्त करने हेतु एक बार अंतिम
कर अपनी तलवारों पर पानी चढ़ाने लगा। इसी समय हिंदुस्थान की इतिहास-प्रसिद्ध राजधानी को भी मानो नई चेतना मिल गई और दिल्ली के रामहलों में स्वतंत्रता संग्राम की मंत्रणाएं शुरू हो गई। दिल्ली के बादशाह की बादशाही लेकर ही अंगे्रज नहीं रूके अपितु उनकी
1857 का स्वातंत्र्य समर - 81
‘बादशाह’ की शाब्दिक पदवी भी उनके बाद न चले, यह भी तह कर लिया। ऐसी पिन्नावस्था में अपना पूर्व वैभव प्राप्त करने हेतु एक बार अंतिम