प्रदीप्त किया करते थे। विशेषतः सेना में इन लोगों का उपयोग बहुत था। क्योंकि हर टुकड़ी में एक पंडित और एक मुल्ला धार्मिक कार्यों के लिए रखना अनिवार्य होने से उस स्थान पर यही लोग जाकर बैठते थे। सिपाहियों के मन पर उनके धर्मगुरू का दबाव और प्रभाव होने से इन्हीं लोगों के द्वारा स्वतंत्रता के पवित्र धर्म की दीक्षा देना आवश्यक था। स्वतंत्रता के बना धर्मरक्षण असंभव है, यह मर्म जानकर हजारों धर्मगुरू इस राजनीतिक
प्रदीप्त किया करते थे। विशेषतः सेना में इन लोगों का उपयोग बहुत था। क्योंकि हर टुकड़ी में एक पंडित और एक मुल्ला धार्मिक कार्यों के लिए रखना अनिवार्य होने से उस स्थान पर यही लोग जाकर बैठते थे। सिपाहियों के मन पर उनके धर्मगुरू का दबाव और प्रभाव होने से इन्हीं लोगों के द्वारा स्वतंत्रता के पवित्र धर्म की दीक्षा देना आवश्यक था। स्वतंत्रता के बना धर्मरक्षण असंभव है, यह मर्म जानकर हजारों धर्मगुरू इस राजनीतिक