रचना का कार्य करने लगा। ऐसे कितने की स्वतंत्रता के भक्त लोग अपनी जान हथेली पर लिये उस अपार रचना का गुप्त कार्य बड़े कौशल से कर रहे होंगे। परंतु वे थे कौन? कहां के? यह भी स्मृति आज जनता में नहीं रही-हाय-हाय!
जिस प्रकार मस्जिद, मंदिर और भिक्षा के बहाने घर-घर में स्वतंत्रता की चेतना उत्पन्न करने मौलवी और पंडित, फकीर और संन्यासी भेजे गए वैसे ही विभिन्न स्थानों से अधिक महत्त्व के स्थान पर उपदेशकों और शिक्षकों
रचना का कार्य करने लगा। ऐसे कितने की स्वतंत्रता के भक्त लोग अपनी जान हथेली पर लिये उस अपार रचना का गुप्त कार्य बड़े कौशल से कर रहे होंगे। परंतु वे थे कौन? कहां के? यह भी स्मृति आज जनता में नहीं रही-हाय-हाय!
जिस प्रकार मस्जिद, मंदिर और भिक्षा के बहाने घर-घर में स्वतंत्रता की चेतना उत्पन्न करने मौलवी और पंडित, फकीर और संन्यासी भेजे गए वैसे ही विभिन्न स्थानों से अधिक महत्त्व के स्थान पर उपदेशकों और शिक्षकों