1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

निजी गर्वया ने सारे हिंदुस्थान के कंठ से निनादित होनेवाले एक राष्ट्रगीत की रचना स्वयं की थी। अपने पूर्वजों के पराक्रम का वर्णन करने के पश्चात् उस राष्ट्रगीत में वर्तमान की अवनति को करूण रस में चित्रित किया गया था। जो लोग एक दिन हिंदुस्थान के इस छोर से उस छोर तक विजयशाली वैभव से अभिशिक्त हुए थे उन्हीं लोगों को आज विश्व में गुलाम कहलाने की बारी आए, उनका धर्म अनाथ हो जाए और उनके अभिषिक्त सिर विदेशियों


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निजी गर्वया ने सारे हिंदुस्थान के कंठ से निनादित होनेवाले एक राष्ट्रगीत की रचना स्वयं की थी। अपने पूर्वजों के पराक्रम का वर्णन करने के पश्चात् उस राष्ट्रगीत में वर्तमान की अवनति को करूण रस में चित्रित किया गया था। जो लोग एक दिन हिंदुस्थान के इस छोर से उस छोर तक विजयशाली वैभव से अभिशिक्त हुए थे उन्हीं लोगों को आज विश्व में गुलाम कहलाने की बारी आए, उनका धर्म अनाथ हो जाए और उनके अभिषिक्त सिर विदेशियों


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