के पैंरों तले कुचले जाएं-इस विपरीत और लज्जास्पद स्थिति के लिए उस राष्ट्रगीत में भारत माता आक्रोष कर रही थी। परंतु अब उसका यह आक्रोश हमें सुनाई देगा क्या? क्या अब वह सन् 1857 का गीत हम फिर सुन सकेंगे? उस राष्ट्रगीत का प्रारूप यदि कोई खोजकर निकाले तो अपने इतिहास पर उसके अक्षय उपकार होंगे। तब तक इतिहास इतना ही कहता है कि अपनी धरती माता सन् 1857 में आक्रोश कर रही थी और कानपुर के मैदान में कूदते समय नाना
के पैंरों तले कुचले जाएं-इस विपरीत और लज्जास्पद स्थिति के लिए उस राष्ट्रगीत में भारत माता आक्रोष कर रही थी। परंतु अब उसका यह आक्रोश हमें सुनाई देगा क्या? क्या अब वह सन् 1857 का गीत हम फिर सुन सकेंगे? उस राष्ट्रगीत का प्रारूप यदि कोई खोजकर निकाले तो अपने इतिहास पर उसके अक्षय उपकार होंगे। तब तक इतिहास इतना ही कहता है कि अपनी धरती माता सन् 1857 में आक्रोश कर रही थी और कानपुर के मैदान में कूदते समय नाना