पनघट, चैकी, धर्मशाला आदि बस्ती की खुली जगह में वीर रसोत्पादक गीत गाकर लोगों को चेताया जाता था। उत्तरी हिंदुस्थान का अति प्रिय गीत आल्हा, जिसे सुनने पर आठ दिन में कहीं-न-कहीं लड़ाई होनी ही चाहिए, ऐसी धारणा है, वह वीर रस से भरा गीत-गाते लोगों की बांहे फड़कने लगी। पूर्वजों के पराक्रम के स्मरण से जब उनका रक्त खौलने लगता तो तुरंत विषय घुमाकर वर्तमान दासता की पूरी बात प्रस्तुत की जाती, इस पर जो ‘हर-हर महादेव’ की गर्जना न करे, ऐसा कापुरूष कोैन होगा?
पनघट, चैकी, धर्मशाला आदि बस्ती की खुली जगह में वीर रसोत्पादक गीत गाकर लोगों को चेताया जाता था। उत्तरी हिंदुस्थान का अति प्रिय गीत आल्हा, जिसे सुनने पर आठ दिन में कहीं-न-कहीं लड़ाई होनी ही चाहिए, ऐसी धारणा है, वह वीर रस से भरा गीत-गाते लोगों की बांहे फड़कने लगी। पूर्वजों के पराक्रम के स्मरण से जब उनका रक्त खौलने लगता तो तुरंत विषय घुमाकर वर्तमान दासता की पूरी बात प्रस्तुत की जाती, इस पर जो ‘हर-हर महादेव’ की गर्जना न करे, ऐसा कापुरूष कोैन होगा?