के मिलने के मुख्य स्थान मेरठ और बैरकपुर ही थे। उत्तर में जैसी संगठित और नियमित रचना थी वैसी ही दक्षिण में बनाने के लिए रंगों बापूजी प्र्रयासरत थे। पटवर्धनी रियासतों ओर कोल्हापुर के दरबार में क्रांतियुद्ध के लिए जाल
1857 का स्वातंत्र्य समर - 86
बुना जा रहा था। अधिक क्या कहा जाए, परंतु ठेठ मद्रास तक इस क्रांतियज्ञ की ज्वालाएं भड़कने लगी थी। सन् 1857 की जनवरी में निम्न घोषणापत्र प्रकाशित हुआ-‘‘हे देशबंधुओं और धर्मनिष्ठों,
के मिलने के मुख्य स्थान मेरठ और बैरकपुर ही थे। उत्तर में जैसी संगठित और नियमित रचना थी वैसी ही दक्षिण में बनाने के लिए रंगों बापूजी प्र्रयासरत थे। पटवर्धनी रियासतों ओर कोल्हापुर के दरबार में क्रांतियुद्ध के लिए जाल
1857 का स्वातंत्र्य समर - 86
बुना जा रहा था। अधिक क्या कहा जाए, परंतु ठेठ मद्रास तक इस क्रांतियज्ञ की ज्वालाएं भड़कने लगी थी। सन् 1857 की जनवरी में निम्न घोषणापत्र प्रकाशित हुआ-‘‘हे देशबंधुओं और धर्मनिष्ठों,