होंगे। जो स्वदेश एवं स्वधर्म के लिए लड़ेेंगे और मरेंगे उन वीर्यवान् शहीदों के लिए स्वर्ग के दरवाजे खुल रहे हैं और जो डरपोक और देशद्रोही अधम इस राष्ट्रकार्य से परावृत्त होंगे उनके लिए नरक के द्वार खुले होंगे। देशबंधुओं, इनमें से तुम क्या स्वीकार करोगे?’’
ऐसी स्थिति में सन् 1857 का उदय हुआ और ऐसी सूचनाएं आने लगी कि हिंदुस्थान में यत्र-तत्र सांकेतिक महत्कार्य का मुहूर्त आ गया। इसी समय कारतूसों का बखेड़ा
होंगे। जो स्वदेश एवं स्वधर्म के लिए लड़ेेंगे और मरेंगे उन वीर्यवान् शहीदों के लिए स्वर्ग के दरवाजे खुल रहे हैं और जो डरपोक और देशद्रोही अधम इस राष्ट्रकार्य से परावृत्त होंगे उनके लिए नरक के द्वार खुले होंगे। देशबंधुओं, इनमें से तुम क्या स्वीकार करोगे?’’
ऐसी स्थिति में सन् 1857 का उदय हुआ और ऐसी सूचनाएं आने लगी कि हिंदुस्थान में यत्र-तत्र सांकेतिक महत्कार्य का मुहूर्त आ गया। इसी समय कारतूसों का बखेड़ा