यही एकमात्र वैधानिक रास्ता खुला रह जाता है। और यदि उनके पास पांडुलिपि की प्रति है ही नही ंतो वे जिस पुस्तक के बारे में अपुष्ट अफवाहों या उड़ती बातों के अलावा कुछ
13
नहीं जानते, उसे राजद्रोहात्मक कहकर प्रतिबंधित कैसे कर सकते हैं?’’ ‘द लंदन टाइम्स’ ने सावरकर के उपर्युक्त पत्र को न केवल पूरा छापा बल्कि उसके साथ अपनी टिप्पणी भी जोड़ी कि यदि सरकार ने ऐसा कठोर और असामान्य पग उठाया आवश्यक समझा तो इससे सि˜ होता है कि दाल में कुछ काला है।
यही एकमात्र वैधानिक रास्ता खुला रह जाता है। और यदि उनके पास पांडुलिपि की प्रति है ही नही ंतो वे जिस पुस्तक के बारे में अपुष्ट अफवाहों या उड़ती बातों के अलावा कुछ
13
नहीं जानते, उसे राजद्रोहात्मक कहकर प्रतिबंधित कैसे कर सकते हैं?’’ ‘द लंदन टाइम्स’ ने सावरकर के उपर्युक्त पत्र को न केवल पूरा छापा बल्कि उसके साथ अपनी टिप्पणी भी जोड़ी कि यदि सरकार ने ऐसा कठोर और असामान्य पग उठाया आवश्यक समझा तो इससे सि˜ होता है कि दाल में कुछ काला है।