1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

के बाद वह शस्त्रधारी उग्रता अपने असंख्य अवयवों के साथ दिल्ली के घर-घर में गोरे रक्त को सूंघने चली! पर निशान के बिना सेना कैसी? और ऐसी सेना का कपड़े का निशान किस काम का? इसलिए जहां भी गोरा सिर मिले वहां उसे भाले पर टांगकर उसका भयानक निशान ‘दीन’ के ताल पर नाचते हुए वह अपूर्व सेना आगे बढ़ती गई।

बादशाह के नाम का जयघोष करते हुए सिपाही और शहर के सैकड़ों लोग दिल्ली के राजमहल में घुसने लगे। रास्ते से घायल होकर


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के बाद वह शस्त्रधारी उग्रता अपने असंख्य अवयवों के साथ दिल्ली के घर-घर में गोरे रक्त को सूंघने चली! पर निशान के बिना सेना कैसी? और ऐसी सेना का कपड़े का निशान किस काम का? इसलिए जहां भी गोरा सिर मिले वहां उसे भाले पर टांगकर उसका भयानक निशान ‘दीन’ के ताल पर नाचते हुए वह अपूर्व सेना आगे बढ़ती गई।

बादशाह के नाम का जयघोष करते हुए सिपाही और शहर के सैकड़ों लोग दिल्ली के राजमहल में घुसने लगे। रास्ते से घायल होकर


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