घुड़सवारों ने अपने घोड़े राजमहल के मैदान में बांधे और सारी रात दौड़ते आए सिपाही दीवानेखास के राजमहल में अपना सामान रख विश्राम करने लगे।
इस तरह दिल्ली का राजमहल लोक-सेना के हाथ आ गया और अब आगे क्या
1857 का स्वातंत्र्य समर - 109
करना है, इस विषय पर बादशाह, बेगम साहिबा और सिपाहियों के नेता वार्Ÿाा करने लगे। पहले निर्धारित योजना के अनुसार 31 मई तक रूकना अब मूर्खता थी। अतः कुछ सोच-विचार के बाद बादशाह
घुड़सवारों ने अपने घोड़े राजमहल के मैदान में बांधे और सारी रात दौड़ते आए सिपाही दीवानेखास के राजमहल में अपना सामान रख विश्राम करने लगे।
इस तरह दिल्ली का राजमहल लोक-सेना के हाथ आ गया और अब आगे क्या
1857 का स्वातंत्र्य समर - 109
करना है, इस विषय पर बादशाह, बेगम साहिबा और सिपाहियों के नेता वार्Ÿाा करने लगे। पहले निर्धारित योजना के अनुसार 31 मई तक रूकना अब मूर्खता थी। अतः कुछ सोच-विचार के बाद बादशाह