अर्थों में राष्ट्रीय क्रांति थी। इसने सि˜ कर दिया कि यूरोप के महान् राष्ट्रों के समान भारत भी राष्ट्रीय चेतना प्रकट कर सकता है।’’
यद्यपि पुस्तक पर लेखक का नाम ‘एक भारतीय राष्ट्रभक्त’ छपा था; किंतु श्री पिरियोन द्वारा लिखित इस प्राक्कथन को फ्रेंच पत्रिका ‘ले कोरियर’ ने अपने 25 जुलाई, 1910 के अंक में छाप दिया। ब्रिटिश कोप से घबराकर फ्रांस की सरकार ने पत्रिका के उस अंक को ही प्रतिबंधित कर दिया।
10 मई,
अर्थों में राष्ट्रीय क्रांति थी। इसने सि˜ कर दिया कि यूरोप के महान् राष्ट्रों के समान भारत भी राष्ट्रीय चेतना प्रकट कर सकता है।’’
यद्यपि पुस्तक पर लेखक का नाम ‘एक भारतीय राष्ट्रभक्त’ छपा था; किंतु श्री पिरियोन द्वारा लिखित इस प्राक्कथन को फ्रेंच पत्रिका ‘ले कोरियर’ ने अपने 25 जुलाई, 1910 के अंक में छाप दिया। ब्रिटिश कोप से घबराकर फ्रांस की सरकार ने पत्रिका के उस अंक को ही प्रतिबंधित कर दिया।
10 मई,