1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

स्पर्श भला न लग रहा हो तो गिर जा नीचे! हमारे वे बंधु अपने पैरों का स्पर्श करने बुला रहे हैं। सारे घंटे टूटकर नीचे गिरने के बाद उनके गिरने की आवाज के साथ वे सिपाही भी विकट हास्य करते हुए एक-दूसरे को कहने लगे-‘‘कैसा तमाशा है! क्या मजा है!!’’

परंतु उधर देसरी तरफ इससे भी भयानक तमाशा चल रहा था। राजमहल के एक ओर अंगे्रजों की सेना के लिए तैयार किया हुआ एक बारूदखाना था। इस बारूदखाने में लड़ाई में आवश्यक सारा


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स्पर्श भला न लग रहा हो तो गिर जा नीचे! हमारे वे बंधु अपने पैरों का स्पर्श करने बुला रहे हैं। सारे घंटे टूटकर नीचे गिरने के बाद उनके गिरने की आवाज के साथ वे सिपाही भी विकट हास्य करते हुए एक-दूसरे को कहने लगे-‘‘कैसा तमाशा है! क्या मजा है!!’’

परंतु उधर देसरी तरफ इससे भी भयानक तमाशा चल रहा था। राजमहल के एक ओर अंगे्रजों की सेना के लिए तैयार किया हुआ एक बारूदखाना था। इस बारूदखाने में लड़ाई में आवश्यक सारा


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