की ओर उनकी सदिच्छा के सिवाय दूसरी कोई शक्ति नहीं थी। जिसने रणभूमि का कभी मुंह भी नहीं देखा, ऐसे एक राजपुत्र पर सेनापतित्व का दायित्व था। उनकी संख्या में सिपाहियों से असैनिक ही अधिक थे और उसमें भी अपने ही देशबंधु सिख और गुरखा-फिरंगियों की ओर हाने से उनका मन निरूत्साहित था। ऐसी स्थिति में यह लड़ाई एक बहुत बड़ा तमाशा होगा, की विलक्षण चेतना उन सिपाहियों के मन में उत्पन्न हो गई थी, जिससे उन्होंने अंगे्रजी
की ओर उनकी सदिच्छा के सिवाय दूसरी कोई शक्ति नहीं थी। जिसने रणभूमि का कभी मुंह भी नहीं देखा, ऐसे एक राजपुत्र पर सेनापतित्व का दायित्व था। उनकी संख्या में सिपाहियों से असैनिक ही अधिक थे और उसमें भी अपने ही देशबंधु सिख और गुरखा-फिरंगियों की ओर हाने से उनका मन निरूत्साहित था। ऐसी स्थिति में यह लड़ाई एक बहुत बड़ा तमाशा होगा, की विलक्षण चेतना उन सिपाहियों के मन में उत्पन्न हो गई थी, जिससे उन्होंने अंगे्रजी