को ही स्वदेशाभिमान का जैसा चैतन्य मिला हुआ था वैसा पंजाब के लोगों को उस समय मिला नहीं था। वास्वत में उनकी स्वतंत्रता गए दस वर्ष भी नहीं हुए थे। अंगे्रजों के कंठनाल पर सन् 1949 में जो सिख सिपाही कुल्हाड़ी चला रहे थे वे ही 1857 में उनके गले क्यों लगे क्यों लगने लगे, इस विलक्षण कूट प्रश्न का खुलासा इसी बात में होनेवाला है कि उनकी स्वतंत्रता जाते-न-जाते ही सन् 1857 की क्रांति आ गई थी। मुसलमानों की परतंत्रता
को ही स्वदेशाभिमान का जैसा चैतन्य मिला हुआ था वैसा पंजाब के लोगों को उस समय मिला नहीं था। वास्वत में उनकी स्वतंत्रता गए दस वर्ष भी नहीं हुए थे। अंगे्रजों के कंठनाल पर सन् 1949 में जो सिख सिपाही कुल्हाड़ी चला रहे थे वे ही 1857 में उनके गले क्यों लगे क्यों लगने लगे, इस विलक्षण कूट प्रश्न का खुलासा इसी बात में होनेवाला है कि उनकी स्वतंत्रता जाते-न-जाते ही सन् 1857 की क्रांति आ गई थी। मुसलमानों की परतंत्रता