1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar

कर सके वैसा बिल्कुल नहीं हो पाता। पंजाब में स्वराज्य की इच्छा नहीं थी। ठाणेश्वर के ब्राह्यण, लुधियाना के मौलवी, फिरोजपुर के दुकानदार और पेशावर के मुसलमान-सभी ‘स्वराज्य


1857 का स्वातंत्र्य समर - 137

और स्वधर्म के लिए जंगी जेहाद करो’, ऐसा उपदेश देते हुए घूम रहे थे। उपर्युक्त पत्र लेखक भी लिखता है-‘‘बादशाह के दरबार से यदि कोई सरदार सेना के साथ इधर भेजा जाए तो पंजाब चुटकी बजाते ही स्वतंत्र हो जाएगा।


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कर सके वैसा बिल्कुल नहीं हो पाता। पंजाब में स्वराज्य की इच्छा नहीं थी। ठाणेश्वर के ब्राह्यण, लुधियाना के मौलवी, फिरोजपुर के दुकानदार और पेशावर के मुसलमान-सभी ‘स्वराज्य


1857 का स्वातंत्र्य समर - 137

और स्वधर्म के लिए जंगी जेहाद करो’, ऐसा उपदेश देते हुए घूम रहे थे। उपर्युक्त पत्र लेखक भी लिखता है-‘‘बादशाह के दरबार से यदि कोई सरदार सेना के साथ इधर भेजा जाए तो पंजाब चुटकी बजाते ही स्वतंत्र हो जाएगा।


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