भेज दिया। एक ओर जिसकी राजनिष्ठा पर अंगे्रजों का अपना पूरा विश्वास है और दूसरी ओर जिसे मातृभूमि अपने अश्रुपूरित नेत्रों से अपलक देख रही है-ऐसी उस बुलंदशहर की सैनिक छावनी की ओर वह ब्राह्यण भयानक कल्पनाओं और अपने भावी यश-अपयश के बादलों से घिरा अपना हृदय लिए तेजी से जाने लगा। मातृभूमि की स्वतंत्रता और स्वधर्म की रक्षा के लिए क्या मेरे स्वदेश बंधु मेरा निवेदन मानेंगे? क्या स्वराज्य के उच्चतर
1857 का स्वातंत्र्य समर - 140
भेज दिया। एक ओर जिसकी राजनिष्ठा पर अंगे्रजों का अपना पूरा विश्वास है और दूसरी ओर जिसे मातृभूमि अपने अश्रुपूरित नेत्रों से अपलक देख रही है-ऐसी उस बुलंदशहर की सैनिक छावनी की ओर वह ब्राह्यण भयानक कल्पनाओं और अपने भावी यश-अपयश के बादलों से घिरा अपना हृदय लिए तेजी से जाने लगा। मातृभूमि की स्वतंत्रता और स्वधर्म की रक्षा के लिए क्या मेरे स्वदेश बंधु मेरा निवेदन मानेंगे? क्या स्वराज्य के उच्चतर
1857 का स्वातंत्र्य समर - 140