हो जाने की मुनादी पीटी गई और बाद में वे सारे सिपाही दिल्ली की ओर जानेवाली अपनी रेजिमेंट के मुख्य भाग से मिल गए।
इस तरह यह पूरी रेजिमेंट एक व्यक्ति के कारण एकाएक विद्रोह कर उठी। इतना ही नहीं अपितु खजाना लूटना, देश स्वतंत्र करना, विदेशियों को अपनी तलवार की
1857 का स्वातंत्र्य समर - 143
नोंक पर रहते हुए भी जीवन-दान देना और बढ़ जाना, इस सारे कार्यक्रम का अभ्यास अलीगढ़, बुलंदशहर, मैनपुरी और इटावा जैसे दूर-दूर के भाग में भी एक साथ करने,
हो जाने की मुनादी पीटी गई और बाद में वे सारे सिपाही दिल्ली की ओर जानेवाली अपनी रेजिमेंट के मुख्य भाग से मिल गए।
इस तरह यह पूरी रेजिमेंट एक व्यक्ति के कारण एकाएक विद्रोह कर उठी। इतना ही नहीं अपितु खजाना लूटना, देश स्वतंत्र करना, विदेशियों को अपनी तलवार की
1857 का स्वातंत्र्य समर - 143
नोंक पर रहते हुए भी जीवन-दान देना और बढ़ जाना, इस सारे कार्यक्रम का अभ्यास अलीगढ़, बुलंदशहर, मैनपुरी और इटावा जैसे दूर-दूर के भाग में भी एक साथ करने,