1857 का स्वातंत्र्य समर - 148
वायव्य प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर का दामाद डाॅ. ‘हे’ भी था। बरेली के सरकारी काॅलेज का प्रिंसिपल डाॅ. कर्सन भी था। बरेली का जिला मजिस्टेªट भी था। एक दिन पूर्व ही राजनिष्ठ खानबहादुर खान इसके गले में गलबहियां डालकर बैठे थे। आज ये सिंहासन पर और वह अपरधी के पिंजरे में था। ज्यूरी की शपथ लेकर रीति अनुसार न्यायासन पर बैठे। अलग-अलग आरोप अलग-अलग अपराधियों पर लगातार उन्हें
1857 का स्वातंत्र्य समर - 148
वायव्य प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर का दामाद डाॅ. ‘हे’ भी था। बरेली के सरकारी काॅलेज का प्रिंसिपल डाॅ. कर्सन भी था। बरेली का जिला मजिस्टेªट भी था। एक दिन पूर्व ही राजनिष्ठ खानबहादुर खान इसके गले में गलबहियां डालकर बैठे थे। आज ये सिंहासन पर और वह अपरधी के पिंजरे में था। ज्यूरी की शपथ लेकर रीति अनुसार न्यायासन पर बैठे। अलग-अलग आरोप अलग-अलग अपराधियों पर लगातार उन्हें