बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। मैडम कामा की भी मृत्यु हो गई। फलतः बहुत खोजबीन के बाद भी उस पांडुलिपि कोई पता नहीं लग पाया। इस प्रकार मराठी साहित्य का एक महान् पुष्प् खो गया और उसकी प्राप्ति की सभी आशाएं समाप्त हो गई।’’
किंतु वीर सावरकर के जीवनीकार धनंजय कीर के अनुसार, ‘‘भारत की स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद वह पांडुलिपि सावरकर के पास बड़े नाटकीय ढंग से वापस लौट आई।’’ उनके अनुसार, ‘‘अभिनव भारत’ के एक सदस्य
बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। मैडम कामा की भी मृत्यु हो गई। फलतः बहुत खोजबीन के बाद भी उस पांडुलिपि कोई पता नहीं लग पाया। इस प्रकार मराठी साहित्य का एक महान् पुष्प् खो गया और उसकी प्राप्ति की सभी आशाएं समाप्त हो गई।’’
किंतु वीर सावरकर के जीवनीकार धनंजय कीर के अनुसार, ‘‘भारत की स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद वह पांडुलिपि सावरकर के पास बड़े नाटकीय ढंग से वापस लौट आई।’’ उनके अनुसार, ‘‘अभिनव भारत’ के एक सदस्य