इस राजनिष्ठा पर सवार होकर अंगे्रज लोग बनारस में अपना आसन अटल करने की बात सोच ही रहे थे कि पड़ोस के आजमगढ़ से भंयकर गर्जना सुनाई देने लगी। आजमगढ़ बनारस से लगभग साठ मील दूर बसा था। वहां 17वीं देशी रेजिमेंट रखी हुई थी। इस रेजिमेंट मंे 31 मई से रोज भयानक खलबली मचने लगी। उसे शांत करने के लिए वहां का मजिस्टेªट मि. हार्न रोज सैनिकों को व्याख्यान देने लगा। पर ऐसे व्याख्यानों से दिल बहलने के दिन अब नहीं रहे थें
इस राजनिष्ठा पर सवार होकर अंगे्रज लोग बनारस में अपना आसन अटल करने की बात सोच ही रहे थे कि पड़ोस के आजमगढ़ से भंयकर गर्जना सुनाई देने लगी। आजमगढ़ बनारस से लगभग साठ मील दूर बसा था। वहां 17वीं देशी रेजिमेंट रखी हुई थी। इस रेजिमेंट मंे 31 मई से रोज भयानक खलबली मचने लगी। उसे शांत करने के लिए वहां का मजिस्टेªट मि. हार्न रोज सैनिकों को व्याख्यान देने लगा। पर ऐसे व्याख्यानों से दिल बहलने के दिन अब नहीं रहे थें