और जरी के झंडों के साथ गश्त लगाते रहे। ऐसी स्थिति में अंगे्रजों का दम घुटने लगा। यद्यपि बनारस शहर अंगे्रजों के कब्जे से छूटते-छूटते रह गया था और सारे सिपाही विद्रोह होते ही अवध की ओर निकल गए थे।
बनारस शहर का 4 जून का प्रयास असफल रह जाने पर वहां हुई पकड़-धकड़ में एक महŸवपूर्ण बात प्रकट हुई। ऐसी ही फुटकर बातों से 1857 के साल में वह रचना-चक्र किस तरह घुमाया जा रहा था, यह ज्ञात होना संभव है। बनारस शहर
और जरी के झंडों के साथ गश्त लगाते रहे। ऐसी स्थिति में अंगे्रजों का दम घुटने लगा। यद्यपि बनारस शहर अंगे्रजों के कब्जे से छूटते-छूटते रह गया था और सारे सिपाही विद्रोह होते ही अवध की ओर निकल गए थे।
बनारस शहर का 4 जून का प्रयास असफल रह जाने पर वहां हुई पकड़-धकड़ में एक महŸवपूर्ण बात प्रकट हुई। ऐसी ही फुटकर बातों से 1857 के साल में वह रचना-चक्र किस तरह घुमाया जा रहा था, यह ज्ञात होना संभव है। बनारस शहर